29 Jul
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शनि की ढैय्या

Posted By: Yagyadutt Times Read: 1950

शनि की ढैय्या एवं साढ़ेसाती


शनि की ढैय्या :- जब शनि चंद्र कुंडली के अनुसार चतुर्थ व अष्टम से गोचर करता है | तो जातक के ऊपर शनि की ढैय्या लग जाती है | ढैय्या का मतलब है ढाई वर्ष की अवधि | जिसमे जातक शनि के विशेष प्रभाव में रहता है वैसे तो शनि प्रत्येक राशि में ढाई वर्ष तक रहता है | परन्तु ढैय्या का विचार और कही से नहीं होता तो फिर चौथे और आठवे से ही क्यो ?

क्योंकि शनि प्रत्येक भाव में धर्म, अर्थ काम, मोक्ष के अनुसार फल देता है | चतुर्थ एवं अष्टम भाव मोक्ष के भाव है | आज दुनिया में ज्यादातर व्यक्ति धर्म की तरफ कम एवं भौतिक सुखों के पीछे ज्यादा भाग रहा है | परन्तु ज्योतिष का एक नियम है कि शनि जिस भाव से धर्म, अर्थ, काम मोक्ष के लिये गोचर करे उसी के अनुसार व्यक्ति को काम करना चाहिए |

जो व्यक्ति शनि की ढैय्या में तीर्थ यार्ता समुद्र स्नान धर्म कर्म एवं दान करते है उन्हें धैय्यामे भी शुभ फलों की प्राप्ति होती है | लेकिन जो व्यक्ति शनि की ढैय्या में इन कामों से दूर रहते है उन्हें शारीरिक व मानसिक परेशानी होती है | और उन्हें कारोबार में विशेष हानि होती है |

चतुर्थ भाव की ढैय्या :- का फल जानने के लिये हम देखेंगे कि शनि किस भाव में बैठा है और कहाँ-कहाँ पर उनकी तीसरी सांतवी एवं दशवी दृष्टि जा रही है | क्योंकि उन भावों से संबंधी जातक को अशुभ फलों की प्राप्ति होती है | चौथे भाव से शनि ‘छठे भाव को दशम भाव को लग्न भाव देखता है | अर्थात जब शनि चौथे भाव से गोचर करता है तो जातक को भौतिक सुखों में कमी यानी चौथा भाव माता, मकान, वाहन, सुख में परेशानी पैदा क्र्तःई | जिसकी वजह से उसे कारोबार में कर्क पड़ता है | जब कारोबार या व्यावसाय में परेशानी होगी तो शारीरिक कष्ट भी होंगे, अर्थात चौथे भाव से शनि जब गोचर करता है तो मकान व वयवसाय में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहिए | और न ही कोई उन्हें नया कार्य करना चाहिए | इस समय शांति पूर्वक अपने काम को करते हुये धार्मिक काम एवं परमात्मा का चिंतन एवं दान पुण्य करते रहना चाहिए |

अष्टम भाव में ढैय्या :- जब शनि चंद्र कुंडली के अनुसार अष्टम भाव से गोचर करता है तो ढैय्या देता है | अष्टम ढैय्या चतुर्थ की ढैय्या से ज्यादा अशुभ होती है | मेरे अनुभाव के अनुसार जब यह ढैय्या शुरू होती है | तो जातक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है | और वह व्यक्ति नया काम करने लगता है | परन्तु अष्टम ढैय्या नया काम करवाकर बीच में ही धोखा दे जाती है | इसलिये प्रत्येक व्यक्ति का अष्टम की ढैय्या में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए | क्योकि अष्टम भाव से शनि तीसरी दृष्टि से दशम भाव को, सांतवी दृष्टि से, द्वितीय भाव को और दसवी दृष्टि से पंचम भाव को देखता है अष्टम भाव की ढैय्या सबसे पहले व्यवसाय में परेशानी पैदा करती है | जिसकी वजह से जातक को निजी कुटुम्ब पर और धन पर बुरा असर पड़ता है | और धन की वजह से संतान को कष्ट अथवा अन्तं से कष्ट प्राप्त होता है | अतः अष्टम की ढैय्या में जातक को कोई भी नया कार्य जैसे बैंक से कर्ज या जमीन जायदाद का खरीदना, बेचना या पिता की संपति को बाँटना नुकसान दायक होता है |

 

शनि की ढैय्या किसको और कब आएगी :-

मेष राशि – शनि जब कर्क एवं वृश्चिक राशि पर भ्रमण करता है |

वृष राशि – शनि जब सिंह व धनु राशि पर भ्रमण करता है |

मिथुन राशि – शनि जब कन्या व मकर राशि पर गोचर भ्रमण करता है |

कर्क राशि – शनि जब तुला व कुंभ राशि पर गोचर भ्रमण करता है |

सिंह राशि – शनि जब वृश्चिक और मीन राशि में गोचर भ्रमण करता है |

कन्या राशि – शनि जब धनु और मेष राशि पर गोचर भ्रमण करता है |

तुला राशि –शनि जब वृष एवं मकर राशि में गोचर भ्रमण करता है |

वृश्चिक राशि – शनि जब कुंभ एवं मिथुन राशि से गोचर भ्रमण करता है |

धनु राशि – शनि जब मीन तथा कर्क राशि से गोचर भ्रमण करता है |

मकर राशि – शनि जब मेष और सिंह राशि में गोचर भ्रमण करता है |

कुंभ राशि – शनि जब वृष और कन्या राशि में गोचर भ्रमण करता है |

मीन राशि – शनि जब मिथुन और तुला राशि से गोचर भ्रमण करता है |

 

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