भारतीय ज्योतिष के अनुसार गोचर
19 May
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भारतीय ज्योतिष के अनुसार गोचर

Posted By: Yagyadutt Times Read: 152

भारतीय ज्योतिष के अनुसार गोचर

गोचर का मतलब है ‘गो’ अर्थात चलना, चर अर्थात ग्रहों का ग्रहों को चलाना गोचर कहलाता है।

ग्रह गोचर के स्थान

सूर्य      3.6.10.11

मंगल     3.6.11

गुरु      2.5.7.9.11

शनि       3.6.11

केतु       3.6.10.11

चंद्र       1.3.6.7.10.11

बुध       2.4.6.8.10.11

शुक्र       1.2.3.4.5

राहु        3.6.10.11


गोचर में 4,8,12 सभी के लिए ख़राब स्थान है तथा इसी प्रकार कुछ सामान्य व कुछ ख़राब भी है।

ब्रहस्पति को छोड़ कर 3,6,10,11 में सभी अच्छे फल देते है। जिस भाव का निर्णय करना होता है। उस भाव/ भावेश तथा उसमे बैठे ग्रह का संबंध दशा-अन्तर्दशा में होना चाहिए जब ही फल मिलता है।

घटना को तारा चक्र से जोड़ना चाहिए तथा तारा चक्र को ध्यान में रखे।

गोचर फलादेश के कुछ सिद्धान्त

1. जो ग्रह जन्म कुण्डली में अशुभ भवन का स्वामी हो या दुःस्थान में पड़ा हो या दुर्बल, नीच राशि या नीच नवांश में हो वह गोचर विचार से शुभ स्थान में होते हुए भी विशेष शुभ फल नही करता।

2. जिस समय गोचर का विचार किया जा रहा हो यदि वह ग्रह नीच राशि, नीच नवांश अपने शत्रु पर से भी विशेष शुभ फल करने में सक्षम होता है मान लीजिये कि आपका कोई मित्र है। आपके साथ सदभाव रखता है किन्तु वह स्वयं निर्धन और दुर्बल है या दुष्टों से घिरा हुआ है(पापाकांत पापदृष्ट है) तो भलाई की और प्रवर्त होने पर भी वह आपकी क्या सहायता कर सकता है।

3. जिस ग्रह के गोचर में विचार कर रहे है वह जन्मकुंडली में शुभ भवन का स्वामी, शुभ स्थान में उच्च, स्वराशी में या उच्च राशि में है और गोचर के समय भी बलवान(उच्च या स्वराशी में) शुभग्रह युक्त शुभग्रह विक्षित है तो वह पूर्ण शुभ फल करेगा। यदि कोई राजा, महाराजा या करोड़पति स्वयं अत्यंत धनी आप पर कृपालु हो तो विशेष चमत्कारिक फल उत्पन्न हो सकता है।

4. यदि गोचरवश कोई ग्रह, शुभ भाव का स्वामी, शुभ भाव में स्थित, लग्नेश का मित्र, षड्वर्ग में बलवान हो तो वह विशेष अशुभ फल नही करता। शुभफल ही करता है।

5. गोचर के समय भी यदि वह ग्रह स्वराशि या उच्च राशि में शुभ ग्रहों से वीक्षित हो तो विशेष अशुभ फल नही करता है। शुभ फल ही करता है।

6. जन्मकुंडली तथा गोचर के समय कोई ग्रह नीच राशि, शत्रु राशि, नीच नवांश में या अस्तगत या क्रूर ग्रहों से युक्त व वीक्षित हो तो घोर अशुभ फल करता है।

7. यदि गोचर वश अपनी स्वयं की राशि, अपनी उच्च राशि या अपने मित्र की राशि में जा रहा हो या उपचय स्थान में जा रहा हो तो ख़राब फल में कमी करता है और अच्छे फल को शरीर भी बढ़ाता है इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये तीन बिंदु है किन्तु स्वराशि और उपचय स्थान में जा रहे है तो उतना ख़राब नही होगा। यदि 5 बिंदु हो और उपचय स्थान में हो-मित्र राशि में हो तो जितना शुभ फल 5 बिंदु के कारण होना चाहिए उससे भी अधिक करेगा।

8. जिस जन्मकुंडली में गोचर का विचार किया जा रहा है उसमे गोचरस्थ राशि में ग्रह है या नही यह देखिये।

9. जब ग्रह गोचरवश शुभ जा रहा हो और अन्य भाव स्थित(जन्मकुंडली में) ग्रह से अंशात्मक-दृष्टि योग करे तब विशेष शुभ फल करता है।

10. गोचर में ग्रह मार्गी से जब वक्री होता है या वक्री से मार्गी होता है तब विशेष प्रभाव दिखाता है।

11. जब ग्रह अग्रिम राशि में चला जाता है तब भी वह आगे की राशि का ही प्रभाव दिखाता रहता है। जब-जब वापस उसी राशि में आता है तब भी।

12. जिसके जन्म नक्षत्र पर(जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में हो) ग्रहण पड़ता है(सूर्य का ग्रहण हो तो सूर्य उस नक्षत्र में हो-चंद्रमा का ग्रहण हो तो चंद्रमा ग्रहण के समय उस नक्षत्र में हो) उस व्यक्ति को बहुत पीड़ा उठानी पडती है।

किसी भाव संबंधी फल गोचर से प्राप्त होने की संभावना निम्न प्रकार से हो सकती है।

1. भाव-गोचर वश भाव में ग्रह का जाना।

2. भावेश से संबंध स्थापित करना।

3. वर्तमान में महादशा नाथ अन्तर्दशा नाथ स्वामी से गोचर के ग्रह का संबंध।

4. गोचर के अनिष्टकारी स्थान से भ्रमण 22 वे द्रेष्कान 64 वे नवांश 85 वे द्वादशांश या मृत्यु भाग से गुजरना अशुभ फलदायी होता है।

5. गोचर के ग्रह तथा जन्म कुण्डली के ग्रह की निकटता।

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