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अहोई अष्टमी

Posted By: Yagyadutt Times Read: 287
अहोई अष्टमी
अहोई अष्टमी का व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और उनकी सफलता के लिए रहती हैं। इस दिन महिलाएं प्रातः उठकर स्नान ध्यान करके एक मिट्टी के मटके में जल भरकर माता अहोई की पूजा करती हैं।कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष के 8 वें दिन अहोई अष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली के ठीक आठ दिन पहले मनाया जाता है।
पूरे दिन निराजल व्रत रख कर तारे देखकर इस व्रत को तोड़ने की प्रथा है। माता अहोई को पूरी, हलवा और चना का भोग लगाते हैं। माता के भोग लगाने के बाद आरती और हवन किया जाता है। अहोई माता की व्रत कथा का लाभ यह होता है कि संतान चाहे वह पुत्र हो या पुत्री उसके ऊपर आने वाले समस्त संकटों का विनाश हो जाता है। संतान दीर्घायु होती है। किसी भी प्रकार के दैहिक, दैविक और भौतिक संताप का नाश होता है। सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।
पूजा का शुभ मुहूर्त-

अहोई अष्टमी तिथि आरंभ: 31 अक्टूबर को प्रातः 11 बजकर 10 मिनट
अष्टमी तिथि समाप्त: 01 नवम्बर 2018 को प्रातः 09 बजकर 09 मिनट
पूजन का शुभ मुहूर्त: सायंकाल 5 बजकर 44 मिनट से सायंकाल 7 बजे तक
तारों को देखने का समय: सायंकाल 06 बजकर 15 मिनट पर

तारों के साथ-साथ होती है चंद्रमा की भी पूजा
इस व्रत के दिन माताएं तारों के साथ साथ चंद्रमा की पूजा और अर्ध्य दे सकती हैं। इस व्रत में तारों को देखकर उनको अर्ध्य देकर पूजा करके खुले आकाश के नीचे माता अघोई की कथा महिलाएं समूह में कहती और सुनती हैं। फिर माता संतान का तिलक करती है। दोनों तारों को प्रणाम कर लंबी उम्र और सकुशलता की प्रार्थना करते हैं।
अब संतान माता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करती है। यह पवित्र पर्व पुत्र को इस बात का एहसास भी दिलाता है कि मां तो मां होती है। पुत्र तारे की तरह सफलता के आकाश पर जगमगाते हुए संसार में अपना नाम रोशन करते हुए माता के नाम को भी सुशोभित करता रहे यही इस पर्व का दार्शनिक पक्ष है।
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